दिल्ली: केंद्र और एलजी के खिलाफ दायर मामले रेखा सरकार ने लिए वापस

भाजपा के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार ने पूर्ववर्ती आम आदमी पार्टी (आप) सरकार की ओर से केंद्र सरकार, उपराज्यपाल और कई वरिष्ठ नौकरशाहों के खिलाफ दायर सभी मामले वापस ले लिए हैं। अधिकारियों ने बताया, भाजपा सरकार ने काम संभालने के बाद अदालतों में याचिका दायर कर कई मामलों की शीघ्र सुनवाई की मांग की थी। ये मामले प्रमुख प्रशासनिक और नीतिगत मुद्दों से संबंधित थे, जो पूर्व आम आदमी पार्टी प्रशासन और केंद्र सरकार, उपराज्यपाल कार्यालय और दिल्ली सरकार के नौकरशाहों के बीच विवाद का मुख्य कारण थे।

पूर्व आम आदमी पार्टी सरकार की ओर से समय-समय पर दायर किए गए इन मामलों में दिल्ली विद्युत नियामक आयोग (डीईआरसी) के अध्यक्ष की नियुक्ति, सेवा संबंधी मामलों पर नियंत्रण, प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन का कार्यान्वयन, दिल्ली जल बोर्ड के लिए निधि, दिल्ली दंगों के मामलों में वकीलों की नियुक्ति और यमुना नदी प्रदूषण पर एक उच्च स्तरीय समिति का गठन शामिल थे।

अधिकारियों के अनुसार, दिल्ली सरकार के विधि विभाग ने फरवरी, 2025 में विधानसभा चुनावों के बाद भाजपा के सत्ता में आने के तुरंत बाद इन मामलों को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। इन मामलों को जारी रखना कानूनी रूप से चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि दिल्ली में सत्ताधारी भाजपा के लिए केंद्र में अपनी ही सरकार और उसके द्वारा नियुक्त उपराज्यपाल के खिलाफ मामले चलाना मुश्किल होता। इसके अलावा, एक अधिकारी ने बताया कि इन मामलों को जारी रखने से सरकारी संसाधनों की बर्बादी होती और कोई लाभ भी नहीं मिलता।

मई 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार को उपराज्यपाल के विरुद्ध दायर सात मामले वापस लेने की अनुमति दी थी। उसी महीने, दिल्ली हाईकोर्ट ने भी सरकार को उपराज्यपाल के उस निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका वापस लेने की अनुमति दी, जिसमें उन्होंने किसानों के विरोध प्रदर्शन और 2020 के दिल्ली दंगों से संबंधित मामलों की पैरवी के लिए वकीलों की नियुक्ति की थी।

कानून विभाग द्वारा पेश किए गए एक आंतरिक प्रस्ताव में कहा गया कि इस तरह के मुकदमों से नौकरशाही को कठिनाई होती है और प्रशासनिक गतिरोध उत्पन्न होता है, जिससे नीतिगत निर्णयों और परियोजनाओं के क्रियान्वयन में देरी होती है। वापस लिए गए मामलों में राष्ट्रपति की ओर से जारी 2023 के अध्यादेश से संबंधित एक मामला भी शामिल था, जिसके जरिये 1991 के जीएनसीटीडी अधिनियम में संशोधन किया था।

आप सरकार और एलजी में विवाद रहा आम
दिल्ली में जब आप सत्ता में थी, तो दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल नजीब जंग, अनिल बैजल और वर्तमान उपराज्यपाल वीके सक्सेना के बीच टकराव आम रहा। पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और फिर आतिशी के नेतृत्व वाली आप सरकार की शिकायत थी कि उपराज्यपाल (एलजी) जानबूझकर उसकी नीतियों के कार्यान्वयन में बाधा डाल रहे हैं। इसमें से कई मामले सुप्रीम अदालत में भी पहुंचे। मसलन, 2023 में आप सरकार ने दिल्ली सरकार (संशोधन) अधिनियम को अदालत में चुनौती दी थी।

इस अधिनियम में राष्ट्रीय राजधानी में अधिकारियों के स्थानांतरण और पोस्टिंग को संभालने के लिए एक नया वैधानिक प्राधिकरण बनाया था। वहीं, एलजी को सरकारी वकीलों की नियुक्ति का अधिकार, स्कूली शिक्षकों को कुछ शर्तों के साथ प्रशिक्षण के लिए फिनलैंड भेजने की अनुमति, यमुना की सफाई की निगरानी के लिए एलजी की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति नियुक्त करने के एनजीटी के आदेश, डीईआरसी के अध्यक्ष की नियुक्ति समेत दूसरे कई मामले शामिल थे। दिल्ली में आप की करारी हार के बाद गठित भाजपा सरकार ने पिछले साल ही इन मामलों को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। अब सुप्रीम कोर्ट से सभी मामलों को दिल्ली सरकार ने वापस ले लिया है।

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