होर्मुज की नाकेबंदी से अमेरिका दोहराने जा रहा 60 साल पुरानी ब्रिटिश भूल

अमेरिका द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी का फैसला सिर्फ एक सैन्य कदम नहीं, बल्कि एक जटिल क्षेत्रीय ताने-बाने को नजरअंदाज करने वाला जोखिम भरा दांव माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह संकट केवल तेल आपूर्ति या समुद्री मार्गों तक सीमित नहीं, बल्कि इतिहास, समाज और स्थानीय पहचान की गहरी परतों से जुड़ा है, जिसे समझे बिना कोई भी बाहरी शक्ति सफल नहीं हो सकती।

विशेषज्ञ इस पूरे घटनाक्रम की तुलना 1956 के स्वेज संकट से कर रहे हैं, जब ब्रिटेन बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय हालात को समझने में नाकाम रहा था। उसने मिस्त्र पर सैन्य दबाव बनाकर नहर पर नियंत्रण बनाए रखना चाहा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय विरोध और अमेरिका-सोवियत दबाव के आगे झुकना पड़ा, जिससे उसके वैश्विक प्रभुत्व के अंत की शुरुआत हुई।

करीब 40 दिनों तक चले अमेरिका-इजरायल और ईरान के टकराव के बाद शांति वार्ता टूटने के तुरंत बाद होर्मुज की नाकेबंदी का फैसला सामने आया है। ऐसे में होर्मुज, जिसे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की धमनी माना जाता है, अब एक बड़े भू-राजनीतिक टकराव का केंद्र बन गया है।

तेल राजतंत्रों की जड़ें और पश्चिमी रणनीति की विरासत

होर्मुज पर नियंत्रण की लड़ाई नई नहीं है। 17वीं सदी में पुर्तगालियों के बाद ब्रिटेन ने यहां अपना प्रभुत्व स्थापित किया और स्थानीय कबीलों व शेखों को साथ लेकर समुद्री मार्गों को सुरक्षित बनाया। यही प्रक्रिया आगे चलकर खाड़ी के आधुनिक तेल राजतंत्रों – यूएई, कतर, बहरीन और कुवैत- की नींव बनी।

1971 के बाद जब अमेरिका ने ब्रिटेन की जगह ली, तो उसने भी इन्हीं शासक परिवारों पर भरोसा बनाए रखा। लेकिन इस दौरान क्षेत्र की जटिल सामाजिक और सांस्कृतिक विविधताओं को काफी हद तक नजरअंदाज किया गया- जो आज की अस्थिरता की एक बड़ी वजह मानी जा रही है।

दिखने वाली एकता के पीछे छिपी विविधता

खाड़ी क्षेत्र को अक्सर अरब-सुन्नी और ईरानी-शिया पहचान के आधार पर देखा जाता है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। ईरान के उत्तरी तट पर अरब और बलूच समुदाय रहते हैं, जिनके तेहरान के साथ संबंध हमेशा सहज नहीं रहे।

वहीं ओमान के मुसंदम प्रायद्वीप जैसे इलाकों में कुमजारी भाषा बोलने वाले समुदाय हैं, जिनकी पहचान समुद्र से गहराई से जुड़ी है और जो खुद को पारंपरिक राष्ट्रीय सीमाओं से अलग महसूस करते हैं।

इन समुदायों की यही अलग पहचान मौजूदा संकट में निर्णायक भूमिका निभा सकती है- खासतौर पर तब, जब राज्य की पकड़ कमजोर होती दिख रही हो।

ईरान कमजोर हुआ तो उभरेंगे स्थानीय समूह

विशेषज्ञों के अनुसार, इजरायल और अमेरिका के लगातार दबाव के बीच ईरान की केंद्रीय सत्ता कमजोर हुई है और शक्ति का केंद्रीकरण आईआरजीसी (ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर) के सीमित दायरे में सिमटता जा रहा है।

ऐसे हालात में होर्मुज के आसपास रहने वाले विभिन्न जातीय और क्षेत्रीय समूह अधिक मुखर हो सकते हैं, जिससे स्थिति और जटिल होने की आशंका है।

ओमान-यूएई तनाव और नया सामरिक खतरा

संकट का एक और अहम पहलू खाड़ी देशों के आपसी मतभेद हैं। जहां यूएई ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाए हुए है, वहीं ओमान पारंपरिक रूप से संतुलित और मध्यस्थ की भूमिका में रहा है।

रिपोर्टों में यह भी संकेत मिला है कि होर्मुज में संभावित टोल सिस्टम को लेकर ओमान और ईरान के बीच चर्चा हुई, हालांकि मस्कट ने इससे इन्कार किया है।

मुसंदम प्रायद्वीप, जो रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है, को लेकर यूएई और ओमान के बीच तनाव की संभावना भी जताई जा रही है। स्थानीय पहचान की राजनीति का इस्तेमाल कर इस क्षेत्र पर प्रभाव बढ़ाने की कोशिशें भविष्य में बड़े टकराव का कारण बन सकती हैं।

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