94 साल में पहली बार; ड्रिल स्क्वायर पर नारी शक्ति ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर भरा अंतिम पग

भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) के चैटवुड भवन का मैदान (ड्रिल स्क्वायर) शनिवार को ऐतिहासिक पलों का साक्षी बना। यहां 94 साल में पहली बार नारी शक्ति ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा और कदम से कदम मिला मार्च पास्ट किया।
इसी के साथ करीब 35 साल पुराना महिलाओं का संघर्ष समानता के रूप में हकीकत बनकर सामने आया। पहली बार नौ महिला अफसर सेना में पूर्णकालिक अफसर बनीं और उन्होंने अपने 472 पुरुष साथियों के साथ देश सेवा की शपथ ली।आईएमए में इस ऐतिहासिक पल की साक्षी तीनों सेनाओं की कमांडर राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू बनीं। उन्होंने भी इसे मील का पत्थर बताया। समाज में दशकों से महिलाओं और पुरुषों की बराबरी की दलीलें दी जाती रही हैं। जहां बराबरी मिली वह किसी की उदार सोच नहीं बल्कि इसके पीछे खुद महिलाओं ने ही लड़ाई लड़ी है।
सेना में पूर्ण कालिक अफसर बनने के पीछे भी महिलाओं का तीन दशक से ज्यादा का संघर्ष छिपा है। दरअसल, महिलाओं के लिए पहली बार सेना में 1992 में शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) के माध्यम से अफसर बनने की राह खुली थी।
भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) के चैटवुड भवन का मैदान (ड्रिल स्क्वायर) शनिवार को ऐतिहासिक पलों का साक्षी बना। यहां 94 साल में पहली बार नारी शक्ति ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा और कदम से कदम मिला मार्च पास्ट किया।
इसी के साथ करीब 35 साल पुराना महिलाओं का संघर्ष समानता के रूप में हकीकत बनकर सामने आया। पहली बार नौ महिला अफसर सेना में पूर्णकालिक अफसर बनीं और उन्होंने अपने 472 पुरुष साथियों के साथ देश सेवा की शपथ ली।आईएमए में इस ऐतिहासिक पल की साक्षी तीनों सेनाओं की कमांडर राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू बनीं। उन्होंने भी इसे मील का पत्थर बताया। समाज में दशकों से महिलाओं और पुरुषों की बराबरी की दलीलें दी जाती रही हैं। जहां बराबरी मिली वह किसी की उदार सोच नहीं बल्कि इसके पीछे खुद महिलाओं ने ही लड़ाई लड़ी है।
सेना में पूर्ण कालिक अफसर बनने के पीछे भी महिलाओं का तीन दशक से ज्यादा का संघर्ष छिपा है। दरअसल, महिलाओं के लिए पहली बार सेना में 1992 में शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) के माध्यम से अफसर बनने की राह खुली थी।



