अब केवल मानसून की बीमारी नहीं रहा डेंगू! मामूली वायरल बुखार समझकर न करें इग्नोर

दशकों तक भारत में डेंगू को एक ऐसी बीमारी माना जाता रहा है, जिसकी चिंता लोग केवल मानसून के दौरान, यानी जून से सितंबर के बीच ही करते हैं। इस मौसम में जब सड़कों पर जलभराव होता है और जगह-जगह पानी जमा हो जाता है, तो हर गली-मोहल्ला मच्छरों के पनपने की जगह बन जाता है। इसलिए बारिश के मौसम में पानी की टंकियों को ढकने, मच्छरदानी का इस्तेमाल करने और अक्टूबर के बाद निश्चिंत हो जाने जैसी सलाह दी जाती रही है। लेकिन अब यह सोच पुरानी हो चुकी है, क्योंकि डेंगू अब केवल मानसून तक सीमित रहने वाली बीमारी नहीं रहा। आइए सीके बिरला हॉस्पिटल, गुड़गांव से एसोसिएट डायरेक्टर – इंटरनल मेडिसिन, डॉ. तुषार तायल से जानते हैं कि आखिर क्यों डेंगू हर मौसम में फैल रहा है और इसको पहचानने के साथ-साथ रोकथाम के लिए क्या किया जाना चाहिए।
डेंगू के मामले बढ़े
भारत में डेंगू के मामलों की बात करें तो फरवरी 2026 के आखिर तक ही करीब 6,927 मामले दर्ज किए जा चुके थे, जो असामान्य रूप से ज्यादा हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि पहले ऐसा माना जाता था कि फरवरी महीने में डेंगू कम फैलता है। इतना ही नहीं, महामारी एक्स्पर्ट्स का कहना है कि यह संख्या 2021 में जनवरी से मई के बीच दर्ज कुल मामलों से भी ज्यादा थी और 2022 की इसी अवधि के आंकड़ों के करीब पहुंच चुकी थी, जबकि मानसून अभी ठीक से शुरू भी नहीं हुआ था।
डेंगू के बढ़ते मामलों की वजह
डेंगू के बढ़ते मामलों की बात करें तो इसके पीछे कोई ऐसे कारण नहीं हैं जिनपर रोक नहीं लगाई जा सकती। ये काफी हद तक हमारी अपनी गतिविधियों से ही जुड़े हैं। पहली वजह तो यह कि बढ़ते तापमान के कारण अब मच्छरों का प्रजनन चक्र सर्दियों में भी पूरी तरह नहीं रुकता। वहीं, गर्म मौसम मच्छरों की सक्रिय अवधि को मानसून से पहले और बाद तक बढ़ा देता है। इसके अलावा, अनियमित बारिश, कभी बहुत तेज़ बारिश, कभी लंबे सूखे के बाद अचानक होने वाली बरसात, पूरे साल अलग-अलग समय पर पानी जमा होने की स्थिति पैदा करती है।
इसके साथ ही तेज़ी से हो रहा शहरीकरण भी समस्या को बढ़ा रहा है। निर्माण स्थल, छतों पर रखी पानी की टंकियां, फेंके हुए टायर और खुले नाले अब पूरे साल मच्छरों के प्रजनन के लिए अनुकूल जगह उपलब्ध कराते हैं, केवल चार महीने नहीं। भारतीय शहरों पर अध्ययन कर रहे सार्वजनिक स्वास्थ्य शोधकर्ताओं ने भी संकेत दिया है कि जलवायु परिवर्तन और अव्यवस्थित शहरी विकास के कारण डेंगू का भौगोलिक और मौसमी दायरा लगातार बढ़ रहा है।
डेंगू की रोकथाम के लिए सलाह
इसका सीधा संदेश यह है कि अब मच्छरों की रोकथाम केवल मानसून के दौरान की जाने वाली जिम्मेदारी नहीं रह गई है। कूलर का पानी खाली करना, पानी के बर्तनों और टंकियों को ढककर रखना, गमलों की ट्रे में जमा पानी हटाना और छत पर पड़े कबाड़ या कचरे की नियमित सफाई पूरे साल की आदत बननी चाहिए, न कि केवल बारिश के मौसम की तैयारी।
डॉक्टर यह भी सलाह देते हैं कि दिसंबर या फरवरी में बुखार, जोड़ों में दर्द या शरीर पर चकत्तों को केवल “मौसमी वायरल” समझकर नजरअंदाज न करें। सिर्फ इसलिए कि मानसून नहीं है, यह मान लेना सही नहीं होगा कि डेंगू नहीं हो सकता, क्योंकि अब धीरे-धीरे ऐसा कोई निश्चित “डेंगू सीजन” बचा ही नहीं है।
यहां एक सावधानी की बात भी समझना जरूरी है। सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि हर साल डेंगू के मामलों की संख्या में काफी उतार-चढ़ाव हो सकता है। किसी एक साल में बड़ा प्रकोप आने के बाद लोगों में उस समय सक्रिय वायरस स्ट्रेन के खिलाफ अस्थायी प्रतिरक्षा विकसित हो जाती है, जिससे अगले साल मामलों में कमी देखी जा सकती है। लेकिन बाद में जब कोई दूसरा वायरस सीरोटाइप फैलता है, तो मामले फिर बढ़ सकते हैं। इसलिए किसी एक साल मामलों में कमी आने का मतलब यह नहीं है कि डेंगू की समस्या खत्म हो गई है।
डेंगू की पहचान कैसे करें?
अगर बुखार एक दिन से अधिक बना रहे, तो अपने नज़दीकी डॉक्टर से जरूर संपर्क करें। यह मानकर न चलें कि यह केवल मौसम बदलने की वजह से हुआ साधारण बुखार है या गर्म सूप पीने से ठीक हो जाएगा। आपको यह नहीं पता हो सकता कि यह डेंगू है या वास्तव में सिर्फ मौसम का असर।
इस सोच को खत्म कर दें कि डेंगू कैलेंडर के हिसाब से फैलने वाली बीमारी है। बस हमें यह समझने में इतना समय लग गया कि इसके लिए कोई तय मौसम नहीं होता।



