हाथरस की मखमली मलाई का नहीं कोई तोड़! एक बार चखने पर स्वाद भुलाना है नामुमकिन

वैसे तो उत्तर प्रदेश का हर कोना अपने खानपान के लिए मशहूर है, लेकिन जब बात मिठास की आती है, तो हाथरस की रबड़ी बाजी मार लेती है।
कड़ाही में घंटों कढ़ते दूध और मखमली मलाई के इस कॉम्बो का नाम सुनते ही हर किसी के मुंह में पानी आ जाता है। आखिर हाथरस के हलवाइयों के हाथों में ऐसा क्या हुनर है, जो इस रबड़ी को स्वाद की दुनिया का ‘बेताज बादशाह’ बनाता है? आइए, डिटेल में जानते हैं।
धीमी आंच का है असली कमाल
हाथरस की रबड़ी का सबसे बड़ा राज इसे बनाने के तरीके में छिपा है। जी हां, मशीनों के इस दौर में भी इसे पारंपरिक तरीके से बनाया जाता है। शुद्ध दूध को लोहे की बड़ी-बड़ी कड़ाहियों में लकड़ी या कोयले की धीमी आंच पर घंटों तक पकाया जाता है। जैसे-जैसे दूध उबलता है, हलवाई उसके ऊपर आने वाली मलाई की परतों को लगातार कड़ाही के किनारों पर चिपकाते जाते हैं। आखिर में, यही गाढ़े और मलाईदार लच्छे इस रबड़ी को एकदम दानेदार और बेजोड़ बनाते हैं।
मिट्टी के सकोरे में परोसी जाती है गाढ़ी रबड़ी
इस रबड़ी का असली मजा तब आता है, जब इसे मिट्टी के सकोरे में परोसा जाता है। दरअसल, मिट्टी के बर्तन दूध की एक्स्ट्रा नमी को सोख लेते हैं, जिससे रबड़ी और भी ज्यादा गाढ़ी हो जाती है। इसके साथ ही, मिट्टी की वह सोंधी-सोंधी महक रबड़ी में घुलकर इसके स्वाद को सौ गुना बढ़ा देती है।
शहरों की मिलावट से कोसों दूर
हाथरस और उसके आस-पास के इलाकों में गाय-भैंस पालन बड़े पैमाने पर होता है, इसलिए यहां की मिठाइयों में इस्तेमाल होने वाला दूध एकदम ताजा और शुद्धता के पैमाने पर भी शहरों से कहीं आगे होता है।
सबसे खास बात है कि इसे गाढ़ा करने के लिए किसी भी तरह के पाउडर या केमिकल का इस्तेमाल नहीं होता। जब इस शुद्ध लच्छेदार रबड़ी के ऊपर पिसी हुई इलायची, थोड़ा-सा केवड़ा वॉटर और कटे हुए बादाम-पिस्ते डाले जाते हैं, तो इसका स्वाद शाही हो जाता है।
एक बार चखेंगे तो उम्रभर याद रखेंगे स्वाद
हाथरस की रबड़ी सिर्फ एक खाने की चीज नहीं है, बल्कि यह यहां की सालों पुरानी विरासत है। यहां शादी-ब्याह हो या कोई भी त्योहार, बिना रबड़ी के हर जश्न अधूरा माना जाता है। जो भी शख्स एक बार यहां की ठंडी और मलाईदार रबड़ी का स्वाद चख लेता है, वह इस जायके को उम्र भर नहीं भूल पाता।



