आरती के बाद जल का आचमन क्यों है जरूरी?

सनातन शास्त्रों में पूजा-पाठ का अधिक महत्व बताया गया है। विशेष नियम का पालन करने से ही साधक को पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है और ईश्वर की कृपा बरसती है। पूजा के दौरान देवी-देवताओं की आरती करने का विधान है।

आरती के बाद की थाली के चारों तरफ जल घुमाकर उसका आचमन करना या उसे भक्तों पर छिड़कना एक अधिक महत्वपूर्ण परंपरा मानी जाती है। आरती के बाद आचमन करने के पीछे का खास रहस्य है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आचमन क्यों किया जाता है और इस दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए। अगर नहीं पता, ऐसे में आइए इस आर्टिकल में आपको विस्तार से बताते हैं इसके बारे में।

क्यों किया जाता है आचमन?
आरती के समय दीपक और कपूर को जलाया जाता है, जिसे अग्नि तत्व का प्रतीक माना जाता है। देवी-देवताओं की आरती करने के बाद ताप को शांत करने और भगवान को शीतलता प्रदान करने के लिए आरती के चारों तरफ जल को घुमाया जाता है।

शरीर की होती है शुद्धि
धार्मिक मान्यता के अनुसार, पूजा से पहले भी आचमन किया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि प्रभु की पूजा के लिए शरीर और मन दोनों का पवित्र होना बहुत जरूरी है। अगर व्यक्ति का शरीर और मन शुद्ध नहीं होता है, तो उसका पूजा-पाठ में मन नहीं लगता, जिसकी वजह से पूजा अधूरी मानी जाती है।

आचमन के दौरान इन बातों का रखें ध्यान
आचमन करते समय आपका मुख भगवान के सामने होना चाहिए।
इस दौरान मंत्रों का जप करना चाहिए।
आचमन के जल को तीन बार जल पिया जाता है और चौथी बार हाथ धोए जाते हैं।
आचमन को खड़े होकर या फिर चलते हुए नहीं करना चाहिए।
इस एक पवित्र स्थान पर ही करना चाहिए।
आचमन को कुशा या ऊनी आसन पर बैठकर करना शुभ माना जाता है।
आचमन का जल हाथ में अधिक नहीं लेना चाहिए। ज्यादा जल लेने से नीचे जमीन पर गिर सकता है। जल बहुत अधिक मात्रा में न पिएं।
आचमन के लिए तांबे, पीतल, चांदी के पात्र का ही प्रयोग करना चाहिए। प्लास्टिक या फिर लोहे का बर्तन का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
आचमन का जल पीने के बाद इसे उसे अपने ऊपर छिड़कते है। इससे व्यक्ति के शरीर में सकारात्मक ऊर्जा प्रवेश करती है।

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