यूक्रेन युद्ध में मृत राजकुमारों और संतों के अवशेष क्यों भेज रहा रूस?

जैसे-जैसे युद्ध एकै और सर्दी में प्रवेश कर रहा है, पूर्वी यूक्रेन में लड़ रही रूसी सेना को एक अनौखा समर्थन मिल रहा है। मध्ययुगीन रूसी शासकों और योद्धा संतों के अवशेषों को सैन्य ठिकानों और मोर्चों पर तैनात यूनिटों तक ले जाया जा रहा है।

सितंबर की शुरूआत में, मॉस्को के राजकुमार दिमित्री डोंस्कोय के अनशेषों का एक टुकड़ी रूसी सैनिकों के पास भेजा गया था। अब इसे रूस के कब्जे वाले यूक्रेन में सैन्य ठिकानों पर ले जाया जा रहा है। यह अवशेष उनके दाहिने हाथ का एक टुकड़ा है, रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च का कहना है कि लड़ाई के दौरान उन्होंने इसी हाथ से तलवार चलाई थी।

मॉस्को पैट्रियार्केट के सैन्य विभाग ने कहा कि संत कमांडर रूसी सैनिकों के साथ अदृश्य रूप से कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहेंगे। CNN की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह कदम उस बड़ी भूमिका का हिस्सा है जो रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च ने युद्ध के दौरान निभाई थी। इसमें रूस के सैन्य अभियान के बारे में सरकारी नैरेटिव के साथ-साथ धार्मिक प्रतीकों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है।

रिपोर्ट में धार्मिक विद्वान और फोर्डहम यूनिवर्सिटी के ऑर्थोडॉक्स क्रश्चियन स्टडीज सेंटर में कम्युनिकशंस डायरेक्टर सर्गेई चौपनिन के हवाले से कहा गया है कि चर्चा व्यावहारिक रूप से राज्य के साथ इस हद तक मिल गया है कि उनमें अंतर करना मुश्किल हो गया है।

डोंस्कोय के अवशेष मोर्चे पर क्यों लाए गए?
ऑर्थोडॉक्स ईसाई धर्म में सैनिकों के पास पवित्र अवशेष ले जाने की परंपरा नई नहीं है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि डोंस्कोय की मध्ययुगीन सैन्य विरासत यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में इन अवशेषों को एक खास महत्व देती है।

चैपनिन ने कहा कि डोंस्कोय को हमलावर के तौर पर नहीं, बल्कि अपनी मातृभूमि के रक्षक के तौर पर पेश किया जाता है। इससे इस ऐतिहासिक हस्ती को युद्ध के बारे में रूस के मौजूदा नैरेटिव से जोड़ा जा सकता है।

एक विद्वान ने बताया कि वह खुद हमलावर नहीं थे, बल्कि मातृभूमि के रक्षक थे। सरकार के नज़रिए से यह दिखाना बहुत जरूरी है कि रूस हमलावर नहीं है, बल्कि हम अपने इलाके की रक्षा कर रहे हैं। चैपनिन ने रूस के मध्ययुगीन अतीत और मौजूदा युद्ध के बीच के इस संबंध को लोगों को एकजुट करने वाली एक कहानी बताया।

क्रेमलिन से चर्च तक: युद्ध के समय में नजदीकी रिश्ता
धार्मिक अवशेषों का यह इस्तेमाल ऐसे समय में हो रहा है जब 2022 में यूक्रेन पर रूस के बड़े हमले के बाद से क्रेमलिन और रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च के बीच संबंध और गहरे हुए हैं।

चर्च ने रूस के सैन्य नजरिए का समर्थन करने के लिए बार-बार धार्मिक भाषा का इस्तेमाल किया है। अगस्त में डोंस्कोय के अवशेषों के मिलने को रूस के राजनीतिक और धार्मिक नेतृत्व ने धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व दिया।

राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इस खोज को बिल्कुल अनोखा और शानदार बताया, जबकि पैट्रियार्क किरिल ने इसे ईश्वर की इच्छा का एक खास संकेत कहा। इन अवशेषों को मॉस्को में भी दिखाया गया, जहां डोंस्कोय के अवशेषों से जुड़े धार्मिक कार्यक्रमों में हजारों लोगों ने हिस्सा लिया।

सैनिक इस बारे में क्या सोचते हैं?
मोर्चे पर तैनात सैनिकों के लिए धार्मिक प्रतीकों का मतलब जरूरी नहीं कि वही हो। कुछ रूसी सैनिकों का कहना है कि जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ रहा है, आस्था और महत्वपूर्ण हो गई है। एक पूर्व रूसी सैनिक ने बताया कि मुश्किल पलों में सैनिक अक्सर ईश्वर की शरण लेते हैं।

उन्होंने कहा कि जब सब कुछ ठीक चल रहा होता है तो हममें से सभी ईश्वर से बात नहीं करते, लेकिन जब हालात बुरे होते हैं तो हर कोई ईश्वर से बात करता है। उन्होंने मोर्चे पर बने अस्थायी चर्चों, मिशन पर जाने से पहले सैनिकों की प्रार्थना और सैन्य इकाइयों व अस्पतालों में पादरियों के दौरे का जिक्र किया।

उन्होंने एक लोकप्रिय रूसी कहावत का हवाला देते हुए कहा कि जैसे फील्ड किचन होता है, वैसे ही हर जगह एक पादरी होना चाहिए, हम रूसी हैं। ईश्वर हमारे साथ है।

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